प्रकृति के साथ सहजीवन का संदेश देता है छठ।

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Chhath Puja in Bihar

प्रकृति के साथ सहजीवन का संदेश देता है छठ।

लोक आस्था का महा पर्व छठ भारत में ऋग्वेद काल से मनाया जाता रहा है और सूर्य की उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भगवत पुराण आदि में विस्तार से मिलता है। मध्यकाल आते-आते यह एक व्यवस्थित पर्व के रूप में समाज मे प्रतिस्थापित हो चुका था। 
छठ के धार्मिक इतिहास पर नजर डालें तो हमे इसकी समृध्दता का पता चलता है| इस पर्व के शुरूआत को लेकर कई मान्यताए प्रचलित हैं :-

1)  श्रीराम सूर्यवंशी थे|सूर्य उनके कुल देवता थे। रावण वध के बाद के जब वह सीता जी को लेकर वापस अयोध्या लौट रहे थे, तो उन्होंने सरयू नदी के तट पर अपने कुल देवता सूर्य की पूजा की। वह तिथि कार्तिक की शुक्ल पक्ष की षष्ठी थी|अपने राजा को सूर्य की उपासना करते देख वहाँ की प्रजा ने भी पूजा करना प्रारंभ कर दिया, जो आज तक चलता आ रहा है। 

2)  महाभारत काल में जब महाराज पांडु अपनी पत्नी कुन्ती और माद्री के साथ वन मे दिन गुजार रहे थे। उन दिनों पुत्र प्राप्ति की इच्छा से सरस्वती नदी में सूर्य की पूजा की थी,फलस्वरुप कुन्ती के गर्भ से कर्ण पैदा हुए| तब से लोग पुत्र प्राप्ति के लिये भी छठ पूजा करते हैं। ऐसी कई और मान्यताए भी प्रचलित है। 
3)  यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है,एक चैत्र मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी के दिन जिसे चैती छठ कहते हैं और दुसरा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के षष्ठी के दिन जिसे कार्तिकी छठ कहा जाता है। अधिक प्रसिद्धि बाद वाले छठ को ज्यादा है। चार रोज तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत तो चतुर्थी तिथि को हो जाती है मगर मुख्य पूजा षष्ठी को संपन्न होती है,इसी कारण इसका नाम छठ पडा। 

4)  सूर्योपासना या छठ उत्तर भारत का एक मुख्य पर्व है, जिसे खासकर बिहार, झारखंड,पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ क्षेत्रों में मनाया जाता है। इस पूजा में धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं, बल्कि एक दुसरे के पारस्परिक सहयोग से सारे कार्यों का संपन्न किये जाते हैं |यह पर्व समाजिक समरसता का उत्कृष्ट उदाहरण है जैसे:-डोम के यहाँ से कच्चे बांस का सूप लाया जाता है,  तो कुम्हार के यहाँ से मिट्टी के दीप और ढकनी |किसान भाईयो से कार्तिक मे होने वाले फल, सब्जी जैसे ईख लिया जाता है। 

5)  छठ में चार दिनों का व्रत रखा जाता है, पहले व्रत के दिन भात के साथ कद्दू की सब्जी खाना अनिवार्य माना जाता है। दूसरे दिन पवनैतिन खीर खाया जाता है जिसे खरना भी कहा जाता है|तीसरे दिन की शाम और चौथे दिन की सुबह मे क्रमशः डूबते और उगते सूर्य को दुग्ध अथवा पानी का अर्घ नदी या तलाब के किनारे दिया जाता है|इस प्रकार व्रत और पूजा संपन्न होती है । पूजा संपन्न होने के बाद मिथिला की महिलाए सामा चेकबा खेलती हैं, खेल में मिट्टी की संरचनाओ का प्रयोग करने के साथ चेकबा गीत भी गाया जाता है। इस दौरान महिलाए अपने भाई के सुखी जीवन की कामना करती हैं। नौ दिन बाद यानी नहान के दिन मिट्टी की संरचनाओ को नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। 

यह पर्व पूरी तरह से इको-फ्रेंडली है जिसमें शुद्धता का पुरा ध्यान रखा जाता है। यह पर्व मिल जुल कर कार्य करने के कारण सामूहिकता का बोध कराता है। एक तरफ जहाँ यह समाज को संयमित करता है वहीं दुसरी ओर नई पीढी को संस्कारित करने का भी काम करता है। यह प्रकृति की की पूजा है। आप सभी को आस्था के महापर्व छठ की हार्दिक शुभकामनाएं। 

जमशेद आलम
मीडिया अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविध्यालय,मोतिहारी

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