साहित्य के क्षेत्र में बिहार का योगदान

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साहित्य के क्षेत्र में बिहार का योगदान

साहित्य के क्षेत्र में बिहार का योगदान

जब बात साहित्य की हो और बिहार का नाम ना आये यह बात असंभव होगी। हिंदी साहित्य में ऐसे अनेक साहित्यकार हुए जिन्होंने बिहार की ही नहीं बल्कि समस्त भारतवर्ष की महानता को दर्शाया है , जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से ज्ञान संस्कार एवं संस्कृति को सुनहरे पथ पर अग्रसर किया।
जैसा कि हम सभी जानते हैं हिंदी साहित्य को चार भागों में बांटा गया है ।
  1. आदिकाल
  2. भक्तिकाल
  3. रितिकाल
  4. आधुनिक काल

और शायद बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि आदि काल से ही बिहार के कवि अपनी रचनाओं से पाठकों का ज्ञान वर्धन करते आ रहे हैं।मैं बात कर रही हूं हिंदी के आदि कवि ‘सरहपा’ के बारे में जो बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में आचार्य के पद पर आसीन थे। यह बताने की जरूरत नहीं है कि तत्कालीन समय में नालंदा विश्वविद्यालय की ख्याति देश-विदेश में प्रसिद्ध थी। इसके अलावा मैथिल कोकिल के नाम से प्रसिद्ध आदिकालीन कवि विद्यापति भी बिहार के थे इनका जन्म बिहार के मधुबनी जिले में हुआ था। आदि काल से ही आरंभ यह सिलसिला आज तक रुका नहीं है हिंदी साहित्य के विकास में आज बिहार के कवि बेझिझक अपना योगदान दे रहे हैं एवं सदा उन्नति के पथ पर अग्रसर रहे हैं।प्रमुख कवियों की अगर बात की जाए तो उनमें रामधारी सिंह दिनकर, जानकी वल्लभ शास्त्री ,गोपाल सिंह नेपाली, नागार्जुन आदि का नाम प्रमुख है । शैली कार की बात करें तो राजा राधिका रमण प्रसाद मिश्र ,आचार्य शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, फणीश्वर नाथ रेणु जैसे महान कहानीकार बिहार के ही थे।

       आज मैं जिस साहित्यकार से आपको परिचित करवाने जा रही हूं वह हैं “हिंदी साहित्य के सूर्य रामधारी सिंह  दिनकर” ।

" रामधारी सिंह दिनकर "​

व्यक्ति, जो हिंदी प्रेमी हो, जिसके हृदय में हिंदी के प्रति गहरी आस्था हो वह रामधारी सिंह दिनकर से भलीभांति परिचित होगा।

व्यक्तित्व:-​

रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के मध्य में स्थित बेगूसराय जिले के सिमरिया नामक ग्राम में हुआ। उनका उपनाम ‘ दिनकर ‘ है ।इनकी शिक्षा पटना विश्वविद्यालय से हुई। दिनकर इतिहास एवं दर्शन शास्त्र के ज्ञाता थे, साथ ही इन्होंने संस्कृत बांग्ला अंग्रेजी और उर्दू का भी गहन अध्ययन किया था । पटना विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद अगले ही वर्ष एक स्कूल में प्रधानाध्यापक के पद पर नियुक्त हुए पर सन् 1934 में इन्होंने बिहार सरकार के अधीन सब- रजिस्ट्रार के पद पर कार्य किया ! दिनकर लगभग 9 वर्षों तक इस पद पर आसीन रहे उस वक्त उन्होंने अत्यंत करीब से बिहार के ग्रामीण जीवन को परखा । सन् 1947 में मुजफ्फरपुर में प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष के पद पर नियुक्त हुए परंतु उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुन लिया गया परंतु अगले ही वर्ष भारत सरकार ने उन्हें 1965 से 1971 तक अपना हिंदी सलाहकार नियुक्त कर लिया और वे दिल्ली आ गए।

कृतित्व :-

दिनकर सामान्यतः वीर रस के कवि माने जाते हैं, इनकी रचनाओं में ओज गुण का प्रभाव ही सर्वाधिक दिखता है । दिनकर एक ऐसे प्रतिभाशाली रचनाकार हैं जिन्होंने निष्पक्ष होकर बेबाकी रूप से रचनाएं लिखी । तत्कालीन समय में जब अन्य राष्ट्र भक्त अलग अलग तरीके से जनता को आजादी के लिए प्रेरित कर रहे थे तब दिनकर ने अपनी लेखनी को चुना ।दिनकर की कविता “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ” इतनी प्रसिद्ध हुई थी कि दिल्ली के रामलीला मैदान में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने हजारों लोगों के मध्य इस कविता का पाठ कर सरकार के खिलाफ विरोध प्रकट किया था । इनकी कविताओं में सर्वदा सामान्य जन की पीड़ा उनकी महत्ता एवं उनके हक का स्वर गुंजित हुआ है ।

उन्होंने कहा है कि :-

“आरती लिए किसे ढूंढता है मुरख,

मंदिरों, राजप्रासादों में , तहखानों में

देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,

देवता मिलेंगे खेतों में खलिहान में।”

हालांकि दिनकर के संदर्भ में जितना कहा जाए वह कम होगा उन्होंने स्वयं अपनी रचना उर्वशी में कहा है कि :-

         ” मर्त्य मानव के विजय का तूर्य हूं मैं

             उर्वशी अपने समय का सूर्य हूं मैं । “

“उर्वशी ” दिनकर की कालजयी रचना है जिसमें इन्होंने उर्वशी और पुरुरवा को एक नवीन रूप देने की कोशिश की है । इसके लिए उन्हें सन् 1972  में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया । उनकी प्रमुख रचनाओं में उर्वशी, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी ,रेणुका, हुंकार ,संस्कृति के चार अध्याय, आदि प्रमुख है । दिनकर की रचनाएं राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत, क्रांति को बढ़ावा देने वाली, भूखे बेबस मजदूरों की सहारा थी।  दिनकर जी की रचनाओं में गतिशीलता देखने को मिलती है क्योंकि अपने उत्तरवर्ती जीवन में वे दर्शनिकता की ओर उन्मुख हो गए थे जबकि , अपनी आरंभिक कविताओं में क्रांति का उद्घोष कर मानव के मन में आजादी की आग भड़काने का प्रयास किया था । इसके साथ ही उनकी रचनाओं में आधुनिकता और परंपरा, धर्म और विज्ञान ,अनैतिकता और भ्रष्टाचारी ,काम, प्रेम और ईष्या आदि का द्वंद दिखाई देता है ।

 दिनकर ने अपने समय की समस्त समस्याओं का उल्लेख रचनाओं में किया है। उन्होंने कहा है कि:-

           “दो राह समय के पथ का घर्घर नाद सुनो,

            सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।”

दिनकर ने इस कविता की रचना तत्कालीन सरकार से रुष्ट होकर की थी । वे राजनीति में आकर भी सत्ता के पुजारी ना हुए । अपने विचार को स्वतंत्र रूप से जाहिर करना दिनकर की प्रमुख विशेषता है परंतु , उनकी रचनाओं में समानता नहीं है उनमें जीवन के विविध आयामों का समावेश है । उनका काव्य उमंग , उत्साह एवं आशा का संचार करता है । दिनकर अपनी कविता में आधुनिकता का विरोध करते हुए कहते हैं कि:-

 राम और कृष्ण कहां है  ? चंद्रगुप्त अशोक कहां है ?

 उनकी कविता वास्तव में आधुनिक युग की निरर्थकता को दर्शाती है । दिनकर का मानना है कि हम किसी का अत्याचार जब तक सहते रहेंगे तब तक हमारा शोषण होता रहेगा अतः उस व्यक्ति के ऊपर हुए अत्याचार का श्रेय उसी व्यक्ति को देते हुए कहते हैं :-

“आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है,

 उलझनें अपनी बनाकर आप ही फंसता,

 और फिर बेचैन हो जगता न सोता है “

“रश्मिलोक” की भूमिका में दिनकर स्वयं कहते हैं “ज्यों – ज्यों मैं संसार की नई कविताओं से परिचित होता गया मेरी अपनी कविताओं की अदाएं बदलती गई ” । यह कथन  उनकी रचनाधर्मिता, गतिशीलता एवं स्वच्छंद वादी विचारधारा को दर्शाती है। अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने चिंतन प्रधान रचनाएं लिखी।

 उन्होंने कहा कि :-

किसको नमन करूं

“तुझको या तेरे नदीश ,गिरिवन को नमन करूं!

 मेरे प्यारे देश, देह या मन को नमन करूं,

 किसको नमन करूं मैं भारत ,किसको नमन करूं।”

दिनकर ने अपनी कविताओं के माध्यम से स्वच्छंदतावादी पाठकों को ज्यादा आकर्षित किया । उनकी रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक मालूम पड़ती है जितनी कल थी । कविताओं के अतिरिक्त दिनकर ने निबंध ,आलोचना आदि  में भी रचनाएं की । आज भी उनकी रचना पाठकों के हृदय पर अमिट छाप छोड़ती है ।

हिंदी साहित्य का यह सूर्य 24 अप्रैल सन् 1974  को सदा के लिए अस्त हो गया परंतु , इनकी रचनाएं आज भी हमारे जीवन को प्रकाशित करती है और आने वाली पीढ़ियों में भी करती रहेगी।

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