मैं पृथ्वी हूँ |

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मैं पृथ्वी हूँ

मैं पृथ्वी हूँ |

पीड़ा तो मेरी भी है,
पर मैं बोल नहीं सकतीं |
आघात मुझे भी पहुँचती हैं,
पर मैं दिखा नहीं सकतीं |
माँ तो मैं भी हूँ लेकिन,
जता नहीं सकतीं |
मेरी कोख से जन्में पादप को जब तुम क्षति पहुँचाते हो,
क्षण भर के कार्य के लिए माँ की ममता को ठेस पहुँचाते हो,
क्या बिगाड़ा है हम सबने तुम्हारा,
क्यों एक माँ की गोद सुनीं करते हो |
कितने यतन से मैंने पाला है इसको,
फिर क्यों काट कर ले जाते हो
चोट भरी कुल्हाड़ी से प्रहार जब तुम करते हो,
उस वक्त सिर्फ पेड़ को नहीं एक माँ के हृदय को भी खंडित करते हो,
मेरी ही ममता के छांव तले उसमें शीतलता के गुण समायी है,
निर्दयी-निष्ठुर की भांति तुम तो पेड़ काट गए,
क्या पता है तुम्हें कि कितने परिंदों का घर उजाड़ गए,
तुम तो मेरी अटुट नींव को भी उखाड़ गए,
कितने ही हरित भूमि को बंजर बना गए,
मत करो इस पर्यावरण के साथ खिलवाड़,
उजड़ जाएगा तुम्हारा भी घर-संसार,
क्यों नहीं करते हो हर पेड़-पौधे और जीव-जन्तुओं का सम्मान,
मैं पृथ्वी हूँ यह तो मेरा भी अपमान है |
-ऋषिकेश

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