बिहार के गुमनाम शहंशाह की प्रेम कहानी जिसने शाहजहां को भी टक्कर दे डाला।

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दसरथ मांझी की कहानी

बिहार के गुमनाम शहंशाह की प्रेम कहानी जिसने शाहजहां को भी टक्कर दे डाला।

अगर कोई आपसे पूछे की क्या हैं मोहब्बत की निशानी, तो आप बेशक ताजमहल का नाम लोगे। और ये सच भी हैं, दुनिया के विरासत में ताज महल को प्रेम की निशानी के तौर पे देखा जाता हैं। 20000 इंसानों और 1000 से भी ज्यादा हाथियों के बदौलत 20 साल में तैयार हुआ ताज महल वाकई प्यार के साथ-साथ खूबसूरती का भी एक नायाब नमूना हैं।

लेकिन क्या आपको ये पता हैं की एक अकेला इंसान, 22 सालों तक अकेला ही छेनी और हथौड़ी से अपने प्यार के लिए पहाड़ खोद कर रास्ता बना दिया?? अगर मालूम हैं तो बधाई, और अगर नहीं मालूम हैं तो कोई बात नहीं हम बता रहे हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं “माउंटेन मैन” दशरथ मांझी की।

पटना से 122 किमी दूर, गया के पास एक छोटा सा गांव है गहलौर, यही 14 जनवरी 1929 को जन्म हुआ एक ऐसे इंसान का, जिसने मोहब्बत के मामले में शहंशाह को ही चुनौती दे डाला। और वो भी क्या खूब टक्कर दिया। अकेले ही अपने दोनो हाथों के बल पर इन्होंने पहाड़ काट कर रास्ता बना दिया। नहीं नहीं, इन्होंने अपनी मोहब्बत का प्रमाण देने के लिए ऐसा नहीं किया बल्कि इन्होंने ऐसा अपनी मोहब्बत के बिछड़ जाने के बाद, दूसरे की मोहब्बत ना मरे इसलिए ऐसा किया।

कहा जाता हैं कि एक बार उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी जब पानी लेे कर आ रही थी, इसी क्रम में पहाड़ से उनका पैर फिसला जिससे उनकी मौत हो गई। गहलौर से को सबसे पास का शहर थे वजीरगंज, इस पहाड़ की वजह से उसकी दूरी लगभग 55किमी था। गाव के लोगो को बहुत ही दिक्कत का सामना करना होता था। बहुतों की मौत सिर्फ समय से इलाज ना मिलने के वजह से हो जाती थी, क्यों की घूम कर जाना पड़ता था। दशरथ मांझी के प्यार को भी इसी पहाड़ ने लील लिया था। वो इस दर्द से उबर ना सके और पहाड़ को ही काटने कि चुनौती डे डाले और भीड़ गए अपने काम में।

शुरुआत में तो सब उन्हें पागल समझने लगे। “देखो रे दशरथ पागल हो गया हैं अपनी मेहरारू के मौत से”,”देखो र सब अकेले चला हैं पहाड़ को काटने”, ऐसी ऐसी बाते लोग उसे देख कर बोला करते थे, लेकिन दशरथ ने जैसे समाज का त्याग कर दिया हो, उनपे तो बस इस पहाड़ को उसकी ऊंचाई का घमंड तोड़ना था। ना धूप देखे ना बरसात और ना ही जाड़ा, बस लगे रहे अपने छेनी और हथौड़ी से पहाड़ काटने में। 22 वर्षों की कड़ी मेहनत, लोगो के ताने ने अपना काम किया और उन्होंने 110 मीटर लंबी सड़क पहाड़ काट कर बना डाली और अपने गांव से वजीरगंज की दूरी को मात्र 15किमी का कर दिया।

आज बिहार को ऐसे शहंशाह पे गर्व हैं जिन्होंने ना तो 20000 इंसानों की मदद की और ना ही किसी जानवर की, वो तो बस अपने प्रेम के मौत के बाद किसी और कि मोहब्बत जाया ना जाए, उसके लिए अकेले पहाड़ काट डाला। नमन हैं ऐसे प्रेमी पर।।

© Anurag Raj

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